Nun Hindi 10th Bihar Board 10th Most Important QnA
1.: “तू ज़िंदा है तो…” शीर्षक कविता क्या प्रकट करती है?
उत्तर: “तू ज़िंदा है तो…” कविता कवि शंकर शैलेंद्र द्वारा
रचित है। यह कविता इंसान को कर्मठ, साहसी और
संघर्षशील बनने का संदेश देती है। कवि कहते हैं कि जब
तक मनुष्य जीवित है, उसे अपने जीवन में अन्याय,
अत्याचार और बुराइयों के खिलाफ डटे रहना चाहिए।
यह कविता जीवन में संघर्ष, जागरूकता और कर्मशीलता
की प्रेरणा देती है।
2: ईद के दिन अमीना क्यों उदास थी?
उत्तर: ईद के दिन अमीना इसलिए उदास थी क्योंकि
हामिद गरीब था और उसके पास नए
कपड़े, जूते या खिलौने खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।
अमीना को डर था कि मेले में अन्य बच्चों को देखकर
हामिद दुखी न हो जाए। वह चाहती थी कि हामिद भी
खुश रहे, लेकिन गरीबी के कारण वह उसके लिए कुछ
भी नहीं खरीद पाई। इसी कारण ईद के दिन भी वह
उदासी महसूस कर रही थी।
3: “ईदगाह” कहानी की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन
करें।
उत्तर: “ईदगाह” कहानी के लेखक मुंशी प्रेमचंद हैं। यह
कहानी गरीबी, प्रेम, त्याग और मानवीय संवेदना पर
आधारित है। कहानी का मुख्य पात्र हामिद एक गरीब
अनाथ बच्चा है, जो ईद के मेले में अपनी दादी अमीना के
लिए चिमटा खरीदता है। कहानी की प्रमुख विशेषताएँ
निम्नलिखित हैं —
. यह कहानी बाल-मन की सच्ची झलक दिखाती है।
. इसमें गरीबी के बीच प्रेम और त्याग की भावना व्यक्त
की गई है।
. हामिद का चरित्र निस्वार्थ प्रेम और करुणा का प्रतीक है।
कहानी में ग्रामीण जीवन और भारतीय समाज का
यथार्थ चित्रण मिलता है।
. प्रेमचंद ने सरल भाषा में भावनात्मक और शिक्षाप्रद
कथा प्रस्तुत की है।
4: हामिद चिमटे को किन-किन रूपों में प्रयोग करने की
बात कही है?
उत्तर: हामिद ने चिमटे को केवल रोटी सेंकने के लिए
नहीं, बल्कि कई रूपों में उपयोगी बताया है। उसने कहा
कि चिमटा बहुत काम की चीज़ है —
कंधे पर रखो तो बंदूक हो गई। हाथ में लिया तो फकीरों
का चिमटा हो गया। यह मंजीरा के काम भी आ सकता है।
इस तरह हामिद ने चिमटे को साधारण वस्तु से वीरता
और बुद्धिमानी का प्रतीक बना दिया।
5: चिमटा देखकर अमीना के मन में कैसा भाव जगा?
उत्तर: जब अमीना ने चिमटा देखा, तो पहले वह नाराज़
हुई कि हामिद ने मिठाई या खिलौने की बजाय चिमटा
खरीद लिया। लेकिन जब हामिद ने बताया कि उसने यह
चिमटा इसलिए लिया ताकि उसका हाथ रोटी सेंकते
समय न जले, तो अमीना की आंखें भर आईं। उसके मन
में गर्व, ममता और आत्म-संतोष का भाव जाग उठा।
उसने महसूस किया कि उसका पोता समझदार, त्यागी
और सच्चे प्रेम वाला है।
6: आप अपने को कर्मवीर कैसे साबित कर सकते हैं?
उत्तर:हम अपने को कर्मवीर अपने दृढ़ निश्चय, परिश्रम
और निष्ठा से साबित कर सकते हैं। जैसे हम विद्यार्थी हैं,
तो विद्याध्ययन हमारा कर्म है। यदि हम पूरी लगन और
ईमानदारी से अध्ययन करते रहें, तो सफलता अवश्य
प्राप्त होगी।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, अब्राहम लिंकन और महात्मा गांधी
जैसे महापुरुषों ने अपने कर्म और संकल्प से संसार को
एक नई दिशा दी।
इसलिए जो व्यक्ति बिना रुके, बिना थके कर्तव्य पालन
करता रहता है, वही सच्चा कर्मवीर कहलाता है।
7: आप किसे अपना आदर्श मानते हैं और क्यों?
उत्तर: मैं अपना आदर्श महात्मा गांधी को मानता हूँ।
उन्होंने सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेजों जैसे
शक्तिशाली शासकों को बिना हथियार उठाए भारत
छोड़ने पर मजबूर कर दिया। गांधीजी जो कहते थे, वही
करते भी थे।
उन्होंने देश की आज़ादी के लिए बहुत कष्ट सहे, लेकिन
अपने मार्ग से कभी नहीं डिगे। उनमें लोभ, स्वार्थ और
दिखावा बिल्कुल नहीं था। उन्होंने देश की सेवा निःस्वार्थ
भाव से की।
अपने त्याग, सेवा और सच्चाई के कारण वे “राष्ट्रपिता”
कहलाए और आज भी लोगों के दिलों में ‘बापू’ के नाम से
अमर हैं।
8: परिश्रम के द्वारा मनोवांछित लक्ष्य की प्राप्ति कैसे की
जा सकती है?
उत्तर: परिश्रम के द्वारा मनोवांछित लक्ष्य की प्राप्ति की
जा सकती है। इसके लिए किसी व्यक्ति को अपने कार्य
के प्रति पूरा समर्पण और निष्ठा रखनी चाहिए। जब कोई
व्यक्ति लगन और आत्मविश्वास के साथ मेहनत करता है,
तो धीरे-धीरे वह अपने लक्ष्य के करीब पहुँच जाता है।
परिश्रम करने से व्यक्ति में हिम्मत, धैर्य और संघर्ष करने की शक्ति उत्पन्न होती है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उन्होंने
कठिन परिस्थितियों में भी निरंतर मेहनत की और अपने
परिश्रम से महानता का शिखर प्राप्त किया।
9. “धर्म का मर्म आचरण में है, अनुष्ठान में नहीं।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस कथन का अर्थ है कि धर्म का पालन केवल
पूजा-पाठ, व्रत या अनुष्ठान करने में नहीं है, बल्कि शुद्ध
आचरण और सच्चे कर्म में है। जो व्यक्ति अपनी कथनी
और करनी में समानता रखता है, सत्य बोलता है, और
मनुष्यता के मार्ग पर चलता है, वही सच्चा धार्मिक होता
है। अहंकार रहित, लोककल्याण के कार्य करना ही धर्म
का वास्तविक मर्म है।
10 बालगोबिन भगत कबीर को 'साहब' मानते थे। इसके
क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर: बालगोबिन भगत कबीर को ‘साहब’ मानते थे
क्योंकि वे कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं का पालन
करते थे। वे सच्चे, सरल और निष्कपट स्वभाव के थे।
उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला और न किसी से झगड़ा
किया। वे आडंबरों का विरोध करते हुए समानता और
सच्चाई का जीवन जीते थे। इसलिए कबीर उनके जीवन
मार्ग के पथप्रदर्शक थे और वे उन्हें ‘साहब’ कहते थे।
11. बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र की मृत्यु पर भी शोक
क्यों नहीं किया?
उत्तर: बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र की मृत्यु पर शोक
इसलिए नहीं किया क्योंकि वे जानते थे कि शरीर नश्वर
और आत्मा अमर है। मृत्यु के बाद आत्मा परमात्मा में
मिल जाती है, जैसे नदी समुद्र में। उन्होंने संसार की
नश्वरता को समझ लिया था। इसलिए उन्होंने आत्मज्ञानी
होकर अनासक्त भाव से कर्म किया और पुत्र की मृत्यु को
ईश्वरीय नियम मानकर शांत रहे।
12. भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ
किस प्रकार व्यक्त कीं?
उत्तर: बेटे की मृत्यु पर बालगोबिन भगत कबीर के भजन गाने लगे। उन्होंने शव के पास दीपक जलाया और पुत्रवधू को सांत्वना दी। उन्होंने कहा कि यह रोने का नहीं, बल्कि आनंद मनाने का समय है, क्योंकि आत्मा अपने परमात्मा से मिल गई है। भगत ने समझाया कि शरीर नश्वर है, पर आत्मा अमर है। उन्होंने अपने ज्ञान और
वैराग्यभाव से अपनी भावनाएँ व्यक्त कीं।
13. बालगोबिन भगत कौन थे?
उत्तर: बालगोबिन भगत एक गृहस्थ होते हुए भी साधु पुरुष थे। वे संत कबीर के परम भक्त थे और उनके दोहे गाकर लोगों को सदाचार और सच्चाई का संदेश देते थे। वे लोभ, झूठ और आडंबर से दूर रहते थे। उनके जीवन में सादगी, सत्य और भक्ति का अद्भुत मेल था। वे एक उच्च चरित्रवान और आध्यात्मिक व्यक्ति थे।
14. “अब सारा संसार निस्तब्धता में सोया है, बालगोबिन भगत का संगीत जाग रहा है, जगा रहा है।” — व्याख्या कीजिए।
उत्तर: यह पंक्ति लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्र ‘बालगोबिन भगत’ से ली गई है। इसका अर्थ है कि जब संसार मोह-माया और स्वार्थ में सोया है, तब बालगोबिन भगत का भक्ति-संगीत लोगों को सच्चे मार्ग की ओर जगा रहा है। उनका गीत मानवता, प्रेम और भक्ति का प्रतीक है। वह निद्रित आत्माओं को जगाने वाला संगीत है।
15. पतोहू बालगोबिन भगत को छोड़कर क्यों नहीं जाना चाहती थी? (23 A)
उत्तर: पतोहू बालगोबिन भगत को छोड़कर इसलिए नहीं जाना चाहती थी क्योंकि वह सोचती थी कि उसके जाने
के बाद भगत का भोजन-पानी और देखभाल कौन करेगा। उसके मन में अपने ससुर के प्रति सेवा और ममता का भाव था। वह उनके त्याग और भक्ति से प्रभावित थी। परंतु भगत ने अपने वैराग्यपूर्ण जीवन के कारण उसे मायके जाने के लिए विवश कर दिया।
16. बालगोबिन भगत ने पतोहू से बेटे को आग क्यों दिलवाई? (16 A, 21 A, 22 A)
उत्तर: बालगोबिन भगत ने अपने पुत्र की मुखाग्नि उसकी पत्नी से दिलवाई क्योंकि वे रूढ़िवाद और सामाजिक आडंबरों के विरोधी थे। वे मानते थे कि धर्म का पालन सत्य और विवेक से होना चाहिए, न कि परंपराओं से। उन्होंने यह दिखाया कि स्त्री भी उतनी ही योग्य है जितना पुरुष। यह उनके यथार्थवादी और समानतावादी विचारों का परिचायक है।
16. हुंडरू का पानी साँप की तरह चक्कर काटता है, हिरण की तरह छलाँग भरता है और बाघ की तरह गरजता हुआ नीचे गिरता है — वर्णन कीजिए।
उत्तर: हुंडरू का पानी जहाँ पत्थरों और पहाड़ों से टकराता है, वहाँ साँप की तरह चक्कर काटता है। जहाँ कोई बाधा आती है, वहाँ हिरण की तरह छलाँग लगाता है। और जब 243 फुट की ऊँचाई से नीचे गिरता है, तो
बाघ की तरह गरजता है। इस जलप्रपात का रूप कभी मनमोहक तो कभी भयानक प्रतीत होता है
17. हुंडरू का पानी चक्कर काटकर, छलाँग भरता हुआ नीचे गिरता है — इनमें से कौन-सा तरीका आपको अच्छा लगता है और क्यों?
उत्तर: मुझे हुंडरू का पानी जब बाघ की तरह गरजता हुआ नीचे गिरता है, वह सबसे अच्छा लगता है। इस समय सारी जलधाराएँ एक होकर बहती हैं, जिससे दृश्य भव्य और आकर्षक हो जाता है। इसके बाद वही जल शांत होकर नदी का रूप ले लेता है। यह दृश्य मन में रोमांच और सौंदर्य का अद्भुत अनुभव कराता है।
18.. हुंडरू का झरना कैसे बना है?
उत्तर: जहाँ नदी पहाड़ को पार करने की कोशिश करती है, वहाँ उसका पानी कई धाराओं में बँट जाता है। जब वे सारी धाराएँ मिलकर पहाड़ से नीचे गिरती हैं, तो वही हुंडरू का झरना बनता है। इसकी ऊँचाई 243 फुट है। यह झरना राँची और हजारीबाग के बीच बहता है। सूर्य की किरणों में इसका पानी इंद्रधनुष जैसा सतरंगा दिखाई देता है।
19. "स्वयं झरने से भी ज्यादा खूबसूरत मालूम होता है, झरने से आगे का दृश्य" — उस दृश्य की सुंदरता का वर्णन कीजिए।
उत्तर: झरने के आगे का दृश्य अत्यंत मनमोहक और शांत दिखाई देता है। पहाड़ों के बीच एक पतली-सी नदी बहती है जो थर्मामीटर के पारे जैसी चमकती है। इसके चारों ओर हरी-भरी वनस्पति और चट्टानों का समूह फैला है। यह दृश्य झरने की गरज के बाद एक शांत सौंदर्य का अनुभव कराता है, जो देखने वालों के मन को मोह लेता है।
20 : बिहारी किस काल के कवि हैं? ‘बिहारी के दोहे’ शीर्षक कविता में किस तरह के दोहे शामिल हैं?
उत्तर: बिहारी रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी रचनाओं में भाव, भाषा और अलंकार की अद्भुत छटा मिलती है। ‘बिहारी के दोहे’ शीर्षक कविता में भक्ति और नीतिपरक दोहे शामिल हैं। इन दोहों में जीवन जीने की प्रेरणा, नीति, प्रेम, भक्ति तथा मानव व्यवहार से जुड़ी शिक्षाएँ दी गई हैं। बिहारी ने अपने दोहों के माध्यम से समाज को सही दिशा देने का प्रयास किया है।
21. प्रश्न: सुख-दुख को समान रूप से क्यों स्वीकारना चाहिए?
उत्तर: कवि बिहारी अपने दोहे में यह संदेश देते हैं कि जीवन में सुख-दुख दोनों ही आवश्यक हैं। सुख हमें आनंद देता है और दुख हमें अनुभव तथा सहनशीलता सिखाता है। इसलिए व्यक्ति को विपत्ति आने पर घबराना नहीं चाहिए और सुख मिलने पर अहंकार नहीं करना चाहिए। सुख-दुख जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं, जिन्हें समान भाव से स्वीकारना ही जीवन की सच्ची समझ है।
. 22: दुर्जन का साथ रहने से अच्छी बुद्धि क्यों नहीं मिल सकती?
उत्तर: कवि बिहारी कहते हैं कि दुर्जन व्यक्ति के साथ रहने से कभी भी अच्छी बुद्धि नहीं मिल सकती। जिस प्रकार हींग को कपूर के साथ रखने पर भी उसमें सुगंध नहीं आती, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति अपनी बुरी प्रवृत्ति कभी नहीं छोड़ता। उसकी बुद्धि सदा बुरे कार्यों में ही लगी रहती है। इसलिए सज्जन व्यक्ति को सदैव बुरे लोगों के संग से बचना चाहिए।
23. प्रश्न: हींग को कर्पूर के साथ रखने से सुगंधित क्यों नहीं होता है? (बिहारी के दोहे के आधार पर)
उत्तर: कवि बिहारी के अनुसार हींग को कर्पूर के साथ रखने से वह सुगंधित नहीं होता, क्योंकि उसकी प्रकृति दुर्गंध वाली होती है। इसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति का संग करने से कोई भी व्यक्ति अच्छा नहीं बन सकता। दुर्जन व्यक्ति अपनी बुरी आदतें नहीं छोड़ता। इसलिए हमें सदा सज्जनों की संगति करनी चाहिए और बुरे लोगों से दूर रहना चाहिए।
24. प्रश्न: गुण नाम से ज्यादा बड़ा होता है — कैसे?
उत्तर: बिहारी जी के अनुसार व्यक्ति का सम्मान उसके नाम या जाति से नहीं, बल्कि उसके गुण और कर्म से होता है। जैसे धतूरे का नाम कनक (सोना) है, परंतु उपयोगी नहीं; जबकि असली सोना सबके काम आता है। उसी प्रकार यदि किसी नीच जाति का व्यक्ति अच्छे कर्म करता है तो समाज में सम्मान पाता है। अतः व्यक्ति का गुण ही उसके नाम से बड़ा होता है।
25. प्रश्न: कहानी ‘ठेस’ में कौन-सा पात्र आपको सबसे अच्छा लगा और क्यों?
उत्तर: ‘ठेस’ कहानी में सिरचन का पात्र सबसे अच्छा लगता है। वह एक कुशल कारीगर, स्वाभिमानी और संवेदनशील व्यक्ति था। वह मेहनत से चिक और शीतलपाटी बनाता था, पर जब उसे अपमानित किया गया तो उसका कलाकार मन आहत हुआ। वह काम छोड़कर चला गया, पर अपनी संवेदनशीलता के कारण मानू की बिदाई के समय स्टेशन पहुँचा। वह सच्चे अर्थों में मर्यादित और आत्मसम्मानी कलाकार था।
26. प्रश्न: सिरचन को पान का बीड़ा किसने दिया था?
उत्तर: सिरचन को पान का बीड़ा मानू ने दिया था। मानू अपने ससुराल के लिए तैयारियाँ कर रही थी और सिरचन उसके लिए चिक और शीतलपाटी बना रहा था। मानू ने प्रेमपूर्वक सिरचन को पान देते हुए कहा कि कामकाज के घर में तरह-तरह की बातें होंगी, इसलिए किसी की बात पर ध्यान न देना। इससे मानू का स्नेह और सिरचन के प्रति सम्मान झलकता है।
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27. प्रश्न: सिरचन के सौगात को किसने खोला और वह कैसा था?
उत्तर: सिरचन के सौगात को लेखक ने खोला। लेखक जब उसे देखता है, तो उसकी कारीगरी देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है। रंग-बिरंगी सुतलियों से बना वह उपहार बेहद सुंदर और बारीकी से बुना हुआ था। उसमें सिरचन की कला, स्नेह और लगन का परिचय स्पष्ट झलकता था। यह उसकी कलात्मकता और मानू के प्रति उसके प्रेम का प्रतीक था।
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28. प्रश्न: गाँव के किसान सिरचन को क्या समझते थे?
उत्तर: गाँव के किसान सिरचन को कामचोर और बेकार समझते थे। खेती-बाड़ी के समय वह खेत में देर से पहुँचता था और धीरे-धीरे काम करता था। इसलिए लोग उसे मजदूरी के काम के लिए नहीं बुलाते थे। परंतु वास्तव में सिरचन आलसी नहीं था, बल्कि एक संवेदनशील कलाकार था। उसे खेत का नहीं, अपने कला-कौशल का काम अधिक प्रिय था।
29. प्रश्न: ‘बच्चे की दुआ’ शीर्षक कविता के रचयिता कौन हैं? यह किस प्रकार की कविता है?
उत्तर: ‘बच्चे की दुआ’ शीर्षक कविता के रचयिता प्रसिद्ध कवि मोहम्मद इक़बाल हैं। यह एक प्रार्थनात्मक कविता है जिसमें कवि ने बच्चों के माध्यम से एक आदर्श समाज की कल्पना की है। इस कविता में नेक, सच्चे, ईमानदार और परोपकारी इंसान बनने की दुआ की गई है ताकि देश और समाज में शांति, प्रेम और एकता बनी रहे।
30 : आपको यदि अल्लाह या ईश्वर से कुछ माँगने की जरूरत हो तो आप क्या-क्या माँगेंगे?
उत्तर: यदि मुझे अल्लाह या ईश्वर से कुछ माँगने की जरूरत हो, तो मैं उनसे सच्चा, ईमानदार और नेक इंसान बनने की शक्ति माँगूंगा। ऐसा व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में मानव कहलाता है, जो सत्यवादी, परिश्रमी, दयालु और दूसरों के दुःख-सुख में सहभागी हो। मैं यह प्रार्थना करूँगा कि मेरे अंदर कभी झूठ, घृणा या स्वार्थ न आए और मैं समाज के लिए उपयोगी बन सकूँ।
31. प्रश्न: अल्लाह और ईश्वर में कोई फर्क नहीं है। इस बात से आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: मैं इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ कि अल्लाह और ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। दोनों एक ही सर्वशक्तिमान परमात्मा के नाम हैं। लोग उन्हें अपने-अपने धर्म और भाषा के अनुसार पुकारते हैं, परंतु वे सबके रक्षक और सृष्टिकर्ता हैं। ईश्वर या अल्लाह किसी एक जाति या धर्म के नहीं, बल्कि समस्त मानवता के पालनहार हैं। इसलिए दोनों एक ही हैं।
32. प्रश्न: पद्मा के ललकारने पर भी अशोक ने युद्ध करना स्वीकार क्यों नहीं किया?
उत्तर: पद्मा के ललकारने पर भी अशोक ने युद्ध स्वीकार नहीं किया क्योंकि उनके सामने एक वीरांगना स्त्री सेना के साथ खड़ी थी। अशोक मानते थे कि स्त्रियों से युद्ध करना शास्त्रविरुद्ध और भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। यदि वे पद्मा से युद्ध करते तो यह भारतीय आदर्श और मर्यादा का अपमान होता। इसलिए उन्होंने संयम और शांति का मार्ग अपनाया और युद्ध से इंकार कर दिया।
33: पद्मा को अशोक से बदला लेने का अच्छा अवसर था, तब भी उसने अशोक को जीवित क्यों छोड़ दिया?
उत्तर: पद्मा को जब अशोक से बदला लेने का अवसर मिला, तब भी उसने अशोक को जीवित छोड़ दिया क्योंकि निहत्थे पर वार करना शास्त्रविरुद्ध और अन्यायपूर्ण माना जाता है। अशोक ने स्त्रियों पर शस्त्र न उठाने का निश्चय कर अपनी तलवार फेंक दी थी। अशोक और उनकी सेना निहत्थी थी, इसलिए पद्मा ने युद्ध नियमों और मानवीयता का पालन करते हुए बदला न लेकर उन्हें जीवित छोड़ने का निर्णय किया।
34. प्रश्न: कल्पना कर बताइए कि यदि अशोक और पद्मा का युद्ध हो गया होता तो क्या होता?
उत्तर: यदि अशोक और पद्मा का युद्ध हुआ होता तो महाविनाश हो जाता। अशोक की विशाल सेना स्त्रियों की सेना को नष्ट कर देती और खून की नदियाँ बहने लगतीं। पद्मा की सेना अपने पिता और भाइयों की मृत्यु से क्रोधित थी, इसलिए दोनों पक्षों में अत्यधिक हानि होती। अशोक ‘महान’ न कहकर ‘हत्यारा’ कहलाते। इस प्रकार दोनों राज्यों का विनाश निश्चित था और मानवता शर्मसार होती।
35. प्रश्न: अगर आप अशोक या पद्मा की जगह होते तो क्या करते और क्यों?
उत्तर: अगर मैं अशोक या पद्मा की जगह होता, तो मैं भी वही करता जो उन्होंने किया। मैं भी धर्म और मानवता की रक्षा करता। जैसे अशोक ने स्त्रियों पर शस्त्र उठाना उचित नहीं समझा, वैसे ही मैं भी संयम रखता। और यदि मैं पद्मा की जगह होता, तो मैं भी निहत्थे पर वार न करता। क्योंकि शास्त्र और मानवता दोनों यही सिखाते हैं कि निहत्थे या निर्बल पर प्रहार करना अधर्म है।
36. प्रश्न: ‘बुद्धं शरणं गच्छामि’, ‘धर्मं शरणं गच्छामि’, ‘संघं शरणं गच्छामि’ — इन वाक्यों का हिन्दी अनुवाद लिखिए।
उत्तर:
(क) बुद्धं शरणं गच्छामि – मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ।
(ख) धर्मं शरणं गच्छामि – मैं धर्म की शरण में जाता हूँ।
(ग) संघं शरणं गच्छामि – मैं संघ (बौद्ध समुदाय) की शरण में जाता हूँ।
इन वाक्यों से बौद्ध धर्म के तीन रत्न — बुद्ध, धर्म और संघ — की महानता का संदेश मिलता है।
37. प्रश्न: ‘अस्त्र’ और ‘शस्त्र’ में क्या अंतर है?
उत्तर: ‘अस्त्र’ और ‘शस्त्र’ दोनों ही युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले हथियार हैं, परंतु दोनों में प्रयोग की विधि भिन्न है। अस्त्र वह होता है जिसे फेंककर चलाया जाता है, जैसे — तीर, रॉकेट या मिसाइल। जबकि शस्त्र वह होता है जिसे हाथ में पकड़कर चलाया जाता है, जैसे — तलवार, भाला, या बंदूक। दोनों का उद्देश्य रक्षा या आक्रमण करना होता है।
38: सगुण भक्तिधारा- इसमें ईश्वर के साकार रूप की आराधना की जाती है।
निर्गुण भक्तिधारा- इसमें ईश्वर के निराकार रूप की आराधना की जाती है।
इस आधार पर कबीर को आप किस श्रेणी में रखेंगे? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर: कबीर ज्ञानाश्रयी शाखा के निर्गुणोपासक संत कवि हैं। उन्होंने निराकार ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की है। उनका विश्वास था कि सच्चे ज्ञान, प्रेम और सदाचार से ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। कबीर ने मूर्तिपूजा, जाति-पाँति, मंदिर-मस्जिद जैसे बाह्य आडंबरों का विरोध किया। उनके अनुसार ईश्वर न तो किसी विशेष स्थान में है और न किसी रूप में बँधा है,
वह हर जीव के भीतर विद्यमान है।
कबीर कहते हैं —
“मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।”
इसलिए कबीर को निर्गुण भक्तिधारा के कवि की श्रेणी में रखा जाता है।
39. संजू को डायरी लिखने की प्रेरणा किससे मिली?
उत्तर: संजू को डायरी लिखने की प्रेरणा महात्मा गाँधी के ‘सत्य के प्रयोग’ नामक पुस्तक से मिली, जिसमें बापू ने अपने जीवन के सत्य प्रयोगों को डायरी के रूप में लिखा था। बापू की तरह ही उसने भी अपने अनुभवों को दर्ज करने की इच्छा की। उसके माता-पिता और दीदी ने भी उसे डायरी लिखने के लिए प्रेरित किया। इस तरह उसने नियमित रूप से अपनी बातें लिखना शुरू किया।
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40. डायरी को रोजनामचा भी कहते हैं। रोजनामचा का तात्पर्य है रोज किये जाने वाले क्रियाकलाप। आप अपने दो दिनों की डायरी (रोजनामचा) लिखिए।
उत्तर: 2 अप्रैल, 2016 (गुरुवार): आज साईं मंदिर में बहुत भीड़ थी। प्रसाद चढ़ाते समय मुझे चक्कर आ गया और मैं बेहोश हो गया। श्रद्धालुओं ने मुझे डॉक्टर के पास पहुँचाया। दवा लेने के बाद मुझे होश आया।
8 जुलाई, 2016 (मंगलवार): आज दोपहर बारह बजे पटना स्टेशन जाने वाली बस से एक मोटरसाइकिल सवार को टक्कर लगी। उसकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। यह घटना देखकर मेरा मन बहुत दुखी हुआ।
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41. 4 जनवरी, 97 को संजू ने अपनी डायरी में क्या लिखा?
उत्तर: 4 जनवरी, 1997 को रविवार था। उस दिन संजू ने चाय पीकर जापानी लड़की "तोतो-चान" की कहानी पढ़नी शुरू की। यह लड़की बहुत शरारती और मनमौजी थी, जिस कारण उसे कई स्कूलों से निकाला गया। लेकिन जब वह रेल के डिब्बों में चलने वाले स्कूल में गई, तो उसकी जिंदगी बदल गई। यह कहानी पढ़कर संजू को बहुत प्रेरणा मिली।
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42. संजू कैसी लड़की थी? उसे किस चीज़ का शौक था?
उत्तर: संजू एक उत्साही, जिज्ञासु और भावनाशील लड़की थी। वह नई-नई चीजें सीखने की इच्छा रखती थी और अपने अनुभवों को डायरी में लिखना पसंद करती थी। उसे पढ़ने, लिखने और दूसरों के अनुभव जानने का बहुत शौक था। वह महात्मा गाँधी जैसी सच्चाई और अनुशासन को अपने जीवन में अपनाना चाहती थी। इस कारण वह सबकी प्यारी और समझदार मानी जाती थी।
43. कैसा वातावरण मिलने पर बुलबुल पंछी गाने लगती है?
उत्तर: पावस ऋतु में जब वर्षा की फुहारें पड़ती हैं, तो सारा वन हरियाली से भर उठता है। शीतल पवन के चलने पर पीपल के पत्ते सर्सर-मर्मर ध्वनि करते हैं। ऐसे सुहावने वातावरण में बुलबुल पक्षी प्रसन्न होकर अपनी मधुर तान छेड़ देती है। वर्षा की बूंदें, पत्तों की सरसराहट और हरियाली से भरा वातावरण बुलबुल को गाने के लिए प्रेरित करता है।
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पीपल का पेड़
44. पीपल का पेड़ हमारे लिए किस प्रकार उपयोगी है?
उत्तर: पीपल का पेड़ अत्यंत उपयोगी है क्योंकि यह दिन-रात ऑक्सीजन छोड़ता है, जो प्राणियों के जीवन के लिए आवश्यक है। यह पेड़ धार्मिक दृष्टि से भी पूजनीय है। इसकी छाया पथिकों को शांति देती है, और यह पक्षियों का आश्रय स्थान बनता है। इसकी छाल और फल औषधि बनाने में काम आते हैं। दीर्घायु और बहुपयोगी होने के कारण यह पेड़ अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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45. निराला को ‘दीनबंधु’ क्यों कहा गया है?
उत्तर: निराला को ‘दीनबंधु’ इसलिए कहा गया है क्योंकि उन्होंने अपना जीवन गरीबों और दुःखियों की सेवा में समर्पित कर दिया था। वे हर दीन व्यक्ति की मदद करते थे और उन्हें प्रेम व सहानुभूति देते थे। जो व्यक्ति दीनों की सहायता करता है, वह दीनबंधु कहलाता है। निराला का हृदय करुणा से भरा था, इसलिए वे सच्चे अर्थों में दीनबंधु थे।
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46. निराला संबंधी बातें लोगों को अतिरंजित क्यों जान पड़ती हैं?
उत्तर: आज के युग में कोई भी व्यक्ति निराला की तरह दीन-दुखियों के प्रति इतना त्यागभाव नहीं रखता। निराला अपने पास का कपड़ा, कंबल या भोजन भी दूसरों को दे देते थे। वे साधारण जीवन जीकर दूसरों के सुख में प्रसन्न रहते थे। आज ऐसी निस्वार्थ भावना दुर्लभ है, इसलिए लोगों को निराला संबंधी बातें अतिरंजित प्रतीत होती हैं।
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47. अपने पैरों पर पानी गिराने से खेमा को तसल्ली क्यों मिलती थी?
उत्तर: अप्रैल का महीना था और तेज धूप पड़ रही थी। खेमा नंगे पैर चाय पहुँचाने और गिलास लाने के लिए गर्म सड़क पर दौड़ता था। उसके पैरों में जलन होती थी। इस जलन को कम करने और थोड़ी राहत पाने के लिए वह अपने पैरों पर पानी डालता था। ऐसा करने से उसे थोड़ी ठंडक और तसल्ली महसूस होती थी।
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48. कसारा का होटल छोड़ने के बाद खेमा के जीवन में किस प्रकार का परिवर्तन आया होगा?
उत्तर: कसारा का होटल छोड़ने के बाद खेमा का जीवन स्वतंत्र और खुशहाल हो गया होगा। पहले वह बंधुआ की तरह काम करता था, पर अब वह आज़ाद पक्षी की तरह जीवन जीने लगा होगा। उसे अब गालियाँ नहीं सुननी पड़तीं होंगी। वह अपने साथियों के साथ खेलता, समय से खाना खाता और अपनी पसंद के काम करता होगा। उसके जीवन में आनंद और आत्मसम्मान लौट आया होगा।
49. खेमा कसारा के होटल पर काम क्यों करता था?
उत्तर: खेमा कसारा के होटल पर काम करता था क्योंकि उसके पिता अत्यंत गरीब थे। गरीबी के कारण वे अपने बच्चों का पालन-पोषण नहीं कर पा रहे थे। इसलिए उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे खेमा को कसारा के हाथों बेच दिया। आठ–नौ वर्ष की छोटी उम्र में ही खेमा काम करने लगा। इस प्रकार, गरीबी और विवशता के कारण ही वह कसारा के होटल में काम करता था।
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50. खेमा द्वारा चप्पल की माँग करने पर कसारा ने क्या जवाब दिया?
उत्तर: जब खेमा ने गर्म सड़क पर पैरों की जलन से बचने के लिए चप्पल माँगी, तो कसारा ने क्रोधित होकर कहा—“अपना काम करो, नहीं तो चप्पलें सिर पर लगेंगी।” उसने व्यंग्य में कहा कि जब खाने को दाने नहीं हैं, तब चप्पल कहाँ से दूँ? इस प्रकार कसारा ने खेमा की माँग का मज़ाक उड़ाया और उसे अपमानित किया।
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51. किन परिस्थितियों में खेमा के पिता ने उसे बेच दिया था?
उत्तर: खेमा के पिता अत्यंत गरीब और असहाय व्यक्ति थे। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि वे परिवार का पालन-पोषण नहीं कर पा रहे थे। न काम था, न आमदनी का कोई साधन। मजबूरी में उन्होंने अपने बेटे खेमा को कसारा के हाथों बेच दिया, ताकि कुछ पैसे मिलकर घर का खर्च चल सके। गरीबी और विवशता ने उन्हें ऐसा कठोर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया।
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52. 'खुशबू रचते हैं हाथ' से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: 'खुशबू रचते हैं हाथ' से कवि का तात्पर्य मेहनतकश श्रमिकों के हाथों से है, जो समाज में सुंदरता और समृद्धि का निर्माण करते हैं। यही हाथ परिश्रम से जीवन में खुशियाँ भरते हैं। लोग जिन वस्तुओं का आनंद लेते हैं, वे इन्हीं हाथों की मेहनत की देन हैं। कवि कहना चाहता है कि श्रम ही जीवन की सच्ची खुशबू है और सफलता उसी पर निर्भर करती है।
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53. खुशबू रचने वाले हाथ कैसी परिस्थितियों में रह रहे हैं?
उत्तर: खुशबू रचने वाले हाथ यानी श्रमिक अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में रहते हैं। उनके घरों के चारों ओर कूड़े-कचरे के ढेर लगे हैं, नालियाँ गंदा पानी बहाती हैं। बदबू और गंदगी से उनका जीवन असहनीय बना हुआ है। कवि को यह देखकर दुख होता है कि जो लोग दूसरों के लिए सुंदर और स्वच्छ वातावरण बनाते हैं, वे स्वयं गंदगी में जीने को विवश हैं।
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54. 'पीपल के पत्ते-से नए-नए हाथ' का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'पीपल के पत्ते-से नए-नए हाथ' से तात्पर्य कोमल, नवयुवक और उत्साही हाथों से है। ये वे हाथ हैं जो श्रम के माध्यम से सुंदरता और सृजन का कार्य करते हैं। कवि इन हाथों को सृष्टि के श्रृंगार का प्रतीक मानता है। उनका विश्वास है कि श्रम के बल पर ही जीवन सुखमय और प्रगतिशील बनता है। बिना परिश्रम किसी कार्य की पूर्ति संभव नहीं।
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55. 'उभरी नसों वाले हाथ' का क्या अर्थ है?
उत्तर: 'उभरी नसों वाले हाथ' से कवि का आशय उन मेहनतकश हाथों से है जो वर्षों के परिश्रम से दुर्बल हो गए हैं। गरीबी और मेहनत की मार से उनकी नसें उभर आई हैं। ये हाथ कठिन परिश्रम का प्रतीक हैं। उन्होंने समाज के लिए सुख-सुविधाएँ जुटाई हैं, पर स्वयं अभाव में जीते हैं। ऐसे हाथ मानव श्रम की महानता और त्याग का प्रतीक हैं।
56. जननायक कर्पूरी ठाकुर का जन्म कब हुआ था? उनके माता-पिता का नाम क्या था?
उत्तर: जननायक कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1921 ई० में बिहार के समस्तीपुर ज़िले के पितौंझिया गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम गोकुल ठाकुर और माता का नाम रामदुलारी देवी था। वे एक सामान्य परिवार से थे, परंतु बाल्यावस्था से ही उनमें देशभक्ति और त्याग की भावना थी। आगे चलकर उन्होंने राजनीति में आकर समाज और गरीबों की सेवा को अपना जीवन-लक्ष्य बनाया।
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57. कर्पूरी ठाकुर को कब गिरफ्तार किया गया?
उत्तर: कर्पूरी ठाकुर को पहली बार 23 अक्टूबर 1943 ई० में गिरफ्तार किया गया था। उस समय भारत में आज़ादी की लड़ाई अपने चरम पर थी और वे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे। अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध आंदोलन चलाने के कारण उन्हें जेल भेज दिया गया। जेल में रहते हुए भी उन्होंने देशभक्ति और संघर्ष की भावना को और मजबूत किया।
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58. कर्पूरी ठाकुर को कौन-कौन-सा कार्य करने में आनंद मिलता था?
उत्तर: कर्पूरी ठाकुर को बचपन से ही दौड़ने, तैरने और ग्रामीण गीत गाने में विशेष आनंद मिलता था। वे गाँव की मंडली में डफली बजाते और होली-चैता गीत गाने में अगुआ रहते थे। विधायक बनने के बाद भी उन्होंने अपने इस स्वभाव को नहीं छोड़ा। इसके अलावा उन्हें पढ़ाई करने और गाय चराने में भी मज़ा आता था। वे अत्यंत सरल, मेहनती और लोकजीवन से जुड़े व्यक्ति थे।
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59. मैट्रिक के बाद उच्च शिक्षा के लिए कर्पूरी जी को कहाँ और किस प्रकार जाना पड़ता था?
उत्तर: मैट्रिक के बाद कर्पूरी ठाकुर ने उच्च शिक्षा के लिए दरभंगा के चंद्रधारी मिथिला कॉलेज में प्रवेश लिया। उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी, इसलिए वे रोज़ घुटने तक धोती पहने, कंधे पर गमछा रखे, नंगे पाँव मुक्तापुर स्टेशन तक पैदल चलते थे। वहाँ से ट्रेन पकड़कर कॉलेज पहुँचते और शाम को वापस लौटते थे। इस प्रकार वे प्रतिदिन 50–60 किलोमीटर की यात्रा कर अपनी पढ़ाई पूरी करते थे।
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60. कर्पूरी ठाकुर परिजनों को प्रतीक्षा करने के लिए क्यों कहते हैं?
उत्तर: कर्पूरी ठाकुर अपने परिवार से अधिक जनता के कार्यों को प्राथमिकता देते थे। जब भी परिजन उनसे घर आने या किसी पारिवारिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए कहते, तो वे कहते — “थोड़ा इंतज़ार करो, जनता का काम निपटा लूँ।” उनका जीवन जनता की सेवा और समाज सुधार के लिए समर्पित था। वे मानते थे कि व्यक्ति का कर्तव्य पहले देश और समाज के प्रति होना चाहिए।
61. हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में — इस पंक्ति में 'वीरता' और 'वैभव' का संकेत किस-किस की ओर है?
उत्तर: इस पंक्ति में ‘वीरता’ का संकेत रानी लक्ष्मीबाई की ओर है, जो साहस और पराक्रम की मूर्ति थीं। वहीं ‘वैभव’ का संकेत झाँसी के राजा की ओर है, जो एक समृद्ध और गौरवशाली राज्य के शासक थे। कवयित्री का भाव यह है कि जब रानी लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा से हुआ, तब वीरता और वैभव का पवित्र संगम झाँसी में हुआ।
62. इस कविता से लक्ष्मीबाई की वीरता का वर्णन कीजिए।
उत्तर: कवयित्री ने लक्ष्मीबाई की वीरता का अद्भुत चित्र प्रस्तुत किया है —
“लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार थी।”
रानी की तलवार देखकर मराठे पुलकित हो उठते थे। उन्होंने युद्धभूमि में दुर्गा की तरह अंग्रेज़ों का संहार किया। जिस प्रकार देवी दुर्गा ने राक्षसों को नष्ट किया था, उसी प्रकार रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेज़ सैनिकों को अपने शौर्य से परास्त कर दिया।
63. पंक्ति की पूर्ति करें — सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, आई फिर से नई जवानी थी।
उत्तर: बूढ़े भारत में भी।
इन पंक्तियों में कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने 1857 की क्रांति के समय भारत के पुनर्जागरण का चित्र प्रस्तुत किया है। जब लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं ने स्वतंत्रता संग्राम की मशाल जलाई, तब पूरे देश में नई चेतना, नया जोश और नया उत्साह भर गया। यह भारत की नई जवानी और स्वतंत्रता की ललक का प्रतीक था।
64. झाँसी के मैदान में लक्ष्मीबाई से युद्ध करने कौन-सा लेफ्टिनेंट पहुँचा और वह क्यों भागा?
उत्तर: झाँसी के मैदान में रानी लक्ष्मीबाई से युद्ध करने लेफ्टिनेंट वॉकर पहुँचा था। रानी के साहस, रणकौशल और तलवार के प्रहारों से वह बुरी तरह घायल हो गया। युद्धभूमि में रानी के वीरतापूर्ण आक्रमण को देखकर अंग्रेज़ सैनिक भयभीत हो उठे। परिणामस्वरूप वॉकर घायल होकर युद्धभूमि से भाग खड़ा हुआ। इस घटना से रानी की वीरता का परिचय मिलता है।
65. लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई क्यों लड़ी?
उत्तर: भारत सदियों से अंग्रेजों की गुलामी झेल रहा था। रानी लक्ष्मीबाई ने 1857 में स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लेकर गुलामी की जंजीर तोड़ने का संकल्प लिया। जब अंग्रेज़ों ने झाँसी पर कब्ज़ा करना चाहा, तब रानी ने तलवार उठाई। उन्होंने देशवासियों को आज़ादी के लिए प्रेरित किया। रानी मानती थीं कि स्वतंत्रता ही राष्ट्र का गौरव है। इसी भावना से उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध वीरता से युद्ध किया।
66. लक्ष्मीबाई का बचपन किस प्रकार के खेलों में बीता?
उत्तर: लक्ष्मीबाई बचपन से ही असाधारण और साहसी थीं। वे गुड़ियों से खेलने के बजाय तलवार, ढाल और कृपाण से खेलती थीं। उन्हें युद्धकला, घुड़सवारी, और नकली युद्ध करने में विशेष रुचि थी। वे सैनिकों की तरह व्यूह रचना करतीं और दुर्ग तोड़ने का अभ्यास करती थीं। इस प्रकार हँसी-खेल में ही उन्होंने युद्ध-कौशल सीखा और आगे चलकर एक वीरांगना के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
67. लेखक को बीमार पड़ने की इच्छा क्यों हुई?
उत्तर: लेखक को बीमार पड़ने की इच्छा इसलिए हुई कि उन्हें बीमार होने पर विशेष देखभाल और स्वादिष्ट भोजन मिलने की आशा थी। उन्हें लगा कि पत्नी उनके सिर में तेल लगाएगी, तरह-तरह के पकवान बनाएगी और मित्रों का ताँता लगेगा। इन सुख-सुविधाओं की कल्पना में उन्होंने जान-बूझकर अधिक जलपान कर लिया ताकि बीमार हो जाएँ। परंतु आगे चलकर उन्हें अपनी इस इच्छा पर पछतावा हुआ।
68. अपने देश में चिकित्सा की कितनी पद्धतियाँ प्रचलित हैं? उनमें किन-किन पद्धतियों से लेखक ने अपनी चिकित्सा कराई?
उत्तर: हमारे देश में अनेक चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलित हैं — एलोपैथी, आयुर्वेदिक, होमियोपैथी, यूनानी, प्राकृतिक चिकित्सा, झाड़-फूंक और चीनी पद्धति। लेखक ने इन सबमें से एलोपैथी, आयुर्वेदिक और होमियोपैथी पद्धतियों से अपनी चिकित्सा कराई। उन्होंने हर बार अलग-अलग डॉक्टरों की सलाह मानी, परंतु परिणामस्वरूप उनकी हालत और खराब होती गई। इस प्रकार लेखक ने हास्य के माध्यम से चिकित्सा व्यवस्था पर व्यंग्य किया है।
69. सुदामा की दीन-दशा देखकर श्रीकृष्ण किस प्रकार भाव-विह्वल हो गए?
उत्तर: सुदामा की दीन-दशा देखकर श्रीकृष्ण करुणा से भर उठे। वे अपने बाल सखा सुदामा को देखकर अत्यंत भावुक हो गए। जब वे सुदामा के पैर धोने लगे तो उनके फटे पैर, बिवाइयाँ और काँटे देखकर अश्रुपूरित हो गए। उन्होंने अपने आँसुओं से ही उनके पैर धोए। सुदामा की गरीबी देखकर श्रीकृष्ण ने कहा—“मित्र! तुम इतने दिनों तक कष्ट क्यों सहते रहे?” उनका स्नेह, करुणा और प्रेम देखकर सुदामा अभिभूत हो गए।
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70 सुदामा को कुछ न देकर उनकी पत्नी को सीधे वैभव सम्पन्न करने का क्या औचित्य था?
उत्तर: श्रीकृष्ण ने सुदामा को प्रत्यक्ष कुछ न देकर उनकी पत्नी को वैभव सम्पन्न किया, ताकि सुदामा को संकोच न हो। वे जानते थे कि सुदामा दरिद्र और संकोची स्वभाव के हैं; वे दान स्वीकार करने में हिचकेंगे। इसलिए उन्होंने उनकी पत्नी को परोक्ष रूप से संपन्न किया। इससे श्रीकृष्ण का बड़प्पन, संवेदनशीलता और कौतुकप्रिय स्वभाव झलकता है। वे मित्र की लाज रखना और उसे संकोच से बचाना चाहते थे।
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71. गुरु के यहाँ किस बात की याद श्रीकृष्ण ने सुदामा को दिलाई?
उत्तर: श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने गुरु संदीपनि के आश्रम की एक घटना याद दिलाई। एक दिन गुरुमाता ने उन्हें लकड़ी लाने भेजा और खाने को चने दिए थे। सुदामा ने वे चने अकेले खा लिए और जब श्रीकृष्ण ने पूछा, तो बोले—“मैं कुछ नहीं खा रहा हूँ, ठंड से दाँत बज रहे हैं।” वही घटना श्रीकृष्ण को याद आई जब सुदामा ने अपनी पत्नी द्वारा दिए गए चावलों की पोटली छिपाई। श्रीकृष्ण मुस्कराते हुए बोले—“मित्र! तुम चोरी में बचपन से ही निपुण हो।”
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72. अपने गाँव वापस आने पर सुदामा को क्यों भ्रम हुआ?
उत्तर: द्वारका से लौटने पर सुदामा अपने गाँव पहुँचे तो अपनी झोपड़ी खोजने लगे, पर उन्हें वह नहीं मिली। उसकी जगह एक भव्य महल खड़ा था। यह देखकर उन्हें भ्रम हुआ कि कहीं वे गलती से द्वारका लौट तो नहीं आए। श्रीकृष्ण की कृपा से उनकी झोपड़ी राजमहल में बदल गई थी। इस अप्रत्याशित वैभव को देखकर सुदामा को विश्वास नहीं हुआ कि यह सब उनका ही घर है। वे प्रभु की लीला और अपनी किस्मत पर अचंभित रह गए।
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73. कविता ‘राह भटके हिरण के बच्चे को’ में क्या संदेश छुपा है?
उत्तर: कविता “राह भटके हिरण के बच्चे को” में कवि ने मानवता, करुणा और स्नेह का सशक्त संदेश दिया है। कवि ने एक ऐसे बच्चे की कथा कही है जो रास्ता भटक गया है और असहाय है। कवि हमें यह सिखाते हैं कि संसार में सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, दया और सहानुभूति रखनी चाहिए। राह भटके बालक की सहायता कर कवि यह दिखाना चाहते हैं कि दूसरों के दुःख में साथ देना ही सच्चा धर्म है।

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