1. विजयनगर साम्राज्य की ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था को 'आयंगर व्यवस्था' कहा जाता था। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
12 अधिकारी: प्रत्येक गाँव के प्रशासन को चलाने के लिए 12 अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी, जिन्हें सामूहिक रूप से 'आयंगर' कहा जाता था।
आनुवंशिक पद: इन अधिकारियों के पद वंशानुगत होते थे और इन्हें बेचा या गिरवी रखा जा सकता था।
वेतन: इन्हें सेवाओं के बदले नकद वेतन के स्थान पर कर-मुक्त भूमि दी जाती थी।
कार्य: इनका मुख्य कार्य गाँव में शांति बनाए रखना और राजस्व (Tax) वसूलना था।
यह व्यवस्था ग्रामीण स्तर पर शासन को सुव्यवस्थित करने के लिए बनाई गई थी।
2. अशोक के अभिलेखों पर टिप्पणी
सम्राट अशोक भारत के पहले शासक थे जिन्होंने अपने संदेशों को अभिलेखों के माध्यम से जनता तक पहुँचाया।
भाषा और लिपि: ये अभिलेख मुख्यतः प्राकृत भाषा में हैं और ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपियों में लिखे गए हैं।
विषय: इनमें अशोक के 'धम्म' (धर्म), प्रशासनिक सुधारों और मानवता के संदेशों का वर्णन है।
प्रकार: इन्हें शिलालेखों, स्तंभ लेखों और गुहा लेखों में विभाजित किया गया है।
3. चार विदेशी यात्री एवं उनके यात्रा वृत्तान्त
| यात्री का नाम | यात्रा वृत्तान्त (पुस्तक) |
| मेगास्थनीज | इंडिका (Indica) |
| अल-बिरूनी | किताब-उल-हिंद (Kitab-ul-Hind) |
| इब्न बतूता | रिहला (Rihla) |
| फ्रांस्वा बर्नियर | ट्रेवल्स इन द मुगल एम्पायर |
4. भारत में उपनिवेशों की स्थापना के चार कारण
यूरोपीय शक्तियों ने भारत को अपना उपनिवेश इन कारणों से बनाया:
कच्चे माल की प्राप्ति: औद्योगिक क्रांति के लिए कपास और नील जैसे कच्चे माल की जरूरत थी।
तैयार माल के लिए बाजार: अपने कारखानों में बने सामान को बेचने के लिए उन्हें एक बड़े बाजार की तलाश थी।
ईसाई धर्म का प्रचार: यूरोपीय शक्तियाँ अपने धर्म और संस्कृति का प्रसार करना चाहती थीं।
साम्राज्य विस्तार: अपनी शक्ति और गौरव बढ़ाने के लिए अन्य देशों पर अधिकार करना।
5. अभिलेखों के दो महत्व
इतिहास लेखन का आधार: अभिलेख इतिहास जानने के सबसे विश्वसनीय और महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं क्योंकि इनमें तिथियाँ और घटनाएँ स्पष्ट होती हैं।
साम्राज्य की सीमा का ज्ञान: जिस-जिस स्थान पर राजा के अभिलेख मिलते हैं, उससे उस राजा के साम्राज्य के विस्तार का पता चलता है।
6. कार्बन-14 ($C^{14}$) विधि क्या है?
यह तिथि निर्धारण (Dating) की एक वैज्ञानिक विधि है, जिसका उपयोग पुरानी वस्तुओं (जैसे हड्डियाँ, लकड़ी, कोयला) की आयु ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
इस विधि की खोज बी.एफ. लिबी ने की थी। किसी भी जीवित वस्तु में कार्बन के दो रूप $C^{12}$ और $C^{14}$ समान मात्रा में होते हैं, लेकिन मृत्यु के बाद $C^{14}$ धीरे-धीरे घटने लगता है। इसी घटती मात्रा को मापकर वस्तु की प्राचीनता का पता लगाया जाता है।
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