लघु/दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर (गद्य)
मैथिली साहित्य -- डा० अमरनाथ झा
प्रश्न १: मैथिली एक समृद्ध भाषा थिक--कोना?
उत्तर: मैथिली एकटा बहुत पैघ आ समृद्ध भाषा अछि। एकर विकास भारोपीय भाषा परिवारक 'अर्धमागधी' सँ भेल अछि। मैथिलीक अपन व्याकरण, लिपि आ एकटा पैघ साहित्यिक इतिहास अछि। लगभग ७०० वर्ष पहिने ज्योतिरीश्वर ठाकुर 'वर्णरत्नाकर' नामक ग्रन्थ लिखने छलाह, जाहि सँ पता चलैत अछि जे मैथिलीमे गद्य (prose) आ पद्य (poetry) कें रचना कतेक पहिने सँ भँ रहल अछि। 'वर्णरत्नाकर' भारतक सभ सँ पुरान चम्पू काव्य (गद्य-पद्य मिश्रित) मानल जाइत अछि, जे मैथिलीक गौरव बढाबैत अछि।
प्रश्न २: 'वर्णरत्नाकर'क लेखक के छथि? ई कोन रूपें अपन समकालीन रचनाकार सभसँ भिन्न छथि?
उत्तर: 'वर्णरत्नाकर' क लेखक ज्योतिरीश्वर ठाकुर छथि। ओ अपन समयक बाकी लेखक लोकनि सँ अलग छलाह, कारण ओकर मुख्य वजह ओकर गद्य (writing style) छल। ओहि समयमे बेसी क' साहित्यक रचना कविता वा पद्य रूपमे होइत छल, मुदा ज्योतिरीश्वर ठाकुर अपन ग्रन्थमे कविताक संग-संग गद्यक बहुत सुन्दर प्रयोग कएने छथि। एही विशिष्ट शैलीक कारण ओ अपन समकालीन रचनाकार सभ सँ अलग आ श्रेष्ठ छथि।
प्रश्न ३: 'वर्णरत्नाकर'क शैलीक तुलना लेखक कोन पोथीसँ कयने छथि?
उत्तर: 'वर्णरत्नाकर' क लेखन शैलीक तुलना लेखक प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान 'बाणभट्ट' क रचना 'कादम्बरी' सँ कएने छथि। कारण ई अछि जे ओहि समयक गद्य शैलीकें समझब आ लिखब बहुत कठीन काज छल।
प्रश्न ४: मातृभाषाकें विसरि जायब निन्दनीय अछि। किएक?
उत्तर: अपन मातृभाषा (मायबोली) कें बिसरि जायब बहुत खराब आ निन्दनीय बात अछि। मातृभाषा कें बिसरब अपन माय, अपन माटि (मातृभूमि) आ अपन संस्कृति कें बिसरब अछि। आन भाषा सभ तँ सीखबाक लेल बहुत अभ्यास करए पड़ैत अछि, मुदा मातृभाषा बच्चा अपन माय सँ बिना कोनो खास मिहनतक, बहुत सहज आ आसानी सँ सीखि जाइत अछि। ई भाषा सभ सँ मधुर होइत अछि, तेँ एकरा बिसरब पाप थिक।
प्रश्न ५: मातृभाषाक प्रति हमरा लोकनिक की-की कर्त्तव्य होयबाक चाही?
उत्तर: अपन मातृभाषा (मैथिली) क प्रति हमर सभक बहुत रास मुख्य कर्त्तव्य अछि:
मैथिली भाषामे नीक-नीक आ उच्च स्तरक किताब लिखल जाए।
स्कूल आ कॉलेज सभमे मैथिलीक पढाई अनिवार्य (compulsory) कएल जाए आ एकरा शिक्षाक माध्यम बनाओल जाए।
समय-समय पर मैथिलीक पत्र-पत्रिका (magazines) छपैत रहय आ हम सभ ओकरा नियम सँ कीनि क' पढ़ी।
हम सभ आपसमे हमेशा मैथिली भाषामे बातचीत (गप्प-सप्प) करी।
आम लोकक बीच एकर शुद्ध रूपक प्रचार-प्रसार होए।
भाषाक विकासक लेल हमरा सभक तत्परता, लगातार मिहनत, धनक सहयोग, सरकार आ विश्वविद्यालयक मददक संग-संग आम जनताक सहयोगक बहुत आवश्यकता अछि।
लघु/दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर (गद्य)
समीक्षा-वृत्ति -- प्रो० रमानाथ झा
प्रश्न १: समीक्षा की थिक ? पाठक आलोक मे लिखू।
उत्तर: समीक्षाक अर्थ थिक 'नीर-क्षीर विवेक', यानी दूध आ पानि केँ अलग-अलग क' देखब। एकर माध्यम सँ कोनो रचना वा वस्तुक नीक आ खराब गुण केँ स्पष्ट रूप सँ सामने आनल जाइत अछि। समीक्षा सँ पाठकक रुचि सुधरैत अछि आ ओ सभ नीक-खराबक अंतर समझि पाबैत छथि। समाजमे सत्य आ नीक प्रवृत्तिक रक्षा लेल एकटा कुशल समीक्षक (critic) होनाइ बहुत जरूरी अछि। बिना सही समीक्षाक, लोक कोनो कलाक असली सुन्दरता आ ओकर महत्व केँ ठीक सँ नै चीन्हि सकैत अछि।
प्रश्न २: साहित्य ओ समीक्षकक की सम्बन्ध होइछ ?
उत्तर: साहित्य आ समीक्षकक बीच बहुत गहीर सम्बन्ध अछि। प्रतिभा दू प्रकारक होइत अछि:समीक्षक ओही व्यक्ति भ' सकैत छथि जे ओहि विषयक गहीर ज्ञान रखैत होइथ। समीक्षकक काम अछि जे ओ साहित्यक गुण-दोषक निष्पक्ष जाँच क' समाजक सामने राखथि। समीक्षा हमेशा रचना (book/work) क' होबाक चाही, रचनाकार (writer) सँ कोनो राग-द्वेष (व्यक्तिगत दुश्मनी या दोस्ती) नै होनाइ चाही।
कारयित्री प्रतिभा: एही प्रतिभा सँ लेखक साहित्यक निर्माण करैत छथि (जैसे- कथा, कविता, उपन्यास, नाटक आदि लिखब)।
भावयित्री प्रतिभा: एही प्रतिभा सँ समीक्षक ओहि लिखल गेल साहित्यक जाँच आ परीक्षण करैत छथि।
प्रश्न ३: समीक्षा वृत्ति हेतु लेखक कोन-कोन आधारभूत वृत्ति सभक उल्लेख कयलनि अछि ?
उत्तर: लेखक समीक्षा कें चारि श्रेणी वा वृत्ति (categories) मे बांटने छथि:
१. काकवृत्ति (कौआ नँ जकां): ई सभ सँ नीच स्तरक (निम्नकोटि) समीक्षा थिक। जेना कौआ कड़ुआ बोलैत अछि, तहिना एहन समीक्षक केवल रचनाक दोष (कमियाँ) कें खोजैत छथि आ कड़ुआ शब्दक प्रयोग करैत छथि।
२. कोकिल वृत्ति (कोयली नँ जकां): ई समीक्षक अपन दल वा अपन गुटक लोकक नीतिकें सभ सँ उत्तम मानैत छथि आ दोसरकें खराब। ओ अपन लोकक रचनामे कतेको कमी रहला पर ओकरा श्रेष्ठ देखबैत छथि। एकराहो नीक समीक्षा नै मानल गेल अछि।
३. मधुकर वृत्ति (भमरा नँ जकां): जेना भमरा अलग-अलग फूल सँ केवल रस (मधु) निकालैत अछि, तहिना एहन समीक्षक विभिन्न साहित्यिक रचना सँ केवल ओकर नीक गुण केँ ग्रहण करैत छथि आ पाठकक सामने ओकर विशेषता कें रखैत छथि।
४. हंसवृत्ति (हंस नँ जकां): (नोट: पृष्ठक अंतिम भागक अनुसार) हंस जेना दूध आ पानि केँ अलग क' दइत अछि, तहिना ई सभ सँ श्रेष्ठ समीक्षा थिक, जाहिमे गुण आ दोष दुनू कें निष्पक्ष भ' क' देखायल जाइत अछि।
प्रश्न ४: साहित्य-समीक्षा हेतु 'रसिक' होयब किएक आवश्यक मानल गेल अछि? लेखकक धारणाकें अपन शब्द मे लिखू।
उत्तर: एकटा सच्चा आ सफल समीक्षक ओहेन व्यक्ति भ' सकैत छथि, जिनका साहित्यमे गहीर रुचि (interest) होए आ जे साहित्यक रस सँ पूरी तरह परिचित होइथ। जे व्यक्ति खुद 'रसिक' (साहित्यक आनन्द लेनिहार) नै छथि, ओ कोनो रचनाक असली रस वा भाव दोसर पाठक कें कखनो नै समझा सकैत छथि। बिना रुचिक समीक्षा केवल तथ्यहीन (बेकार) भ' जाइत अछि। तेँ साहित्यक नीक-खराबक सही पहचान लेल समीक्षकक रसिक होइब बहुत जरूरी अछि।
ग्राम सेविका -- प्रो० हरिमोहन झा
प्रश्न १: कान पर जनउ चढौने पंडितजी की बजलाह ?
उत्तर: कान पर जनउ चढ़ौने पंडितजी बजलाह जे— "एही युगमे भ्रष्ट लोकक उदय भ' गेल अछि। जे खुद भ्रष्ट अछि, ओ सभकेँ अपन जकाँ बनेबाक चाहैत अछि। ओ (ग्रामसेविका) आबि क' पूरा गामक जनानी सभक मति खराब क' देत। तखने की कोनो बेटी-पुतोह बात मानत? ओकरा 'ग्रामसेविका' नै, बल्कि गाम उजड़बाक लेल 'ग्राम शोधिका' बुझू।"
प्रश्न २: बौकू बाबू उत्तेजित होइत की कहलथिन ?
उत्तर: बौकू बाबू गुस्सा (उत्तेजित) भ' क' बजलाह जे— "एही गाममे ओकर अफसरी ठाठ नै चलतैक। जँ ओ हमरा घरक नियम-कानून बिगाड़य अओती, तँ झोंटा (केश) पकड़ि क' मारब आ मारि-मारि क' ओकर हाथ-पैर (घूठ) तोड़ि देब।"
प्रश्न ३: हँफैट भुटकुन की समाद अनने छलाह ?
उत्तर: भुटकुन हाँफैत (दौड़ल) अपन दादीक समाचार (समाद) लय क' पोखर पर अएलाह। ओ कहलनि जे— "एकटा स्त्री (मौगी) बहुत उज्जर साड़ी पहिरने अएली अछि। ओ दलानमे कुर्सी पर बैसल छथि आ कहैत छथि जे आँगन जा क' सभ सँ भेंट करब। माय आ काकी तँ तैयार छथिन, मुदा दादी कहलनि अछि जे दौड़ि क' अपन बाबा (बौकू बाबू) सँ पूछि क' आओ।"
प्रश्न ४: क्रोधसँ बताह होइत बौकू बाबू की बजलाह ?
उत्तर: क्रोध सँ पागल (बताह) होइत बौकू बाबू बजलाह जे— "ओही हड़ाशंखिनी (ग्रामसेविका) कें आ कोनो दोसर घर नै भेटलैक? सभ सँ पहिने हमरहि घरकें भ्रष्ट (शोधय) कयल अएली अछि?"
प्रश्न ५: आँगन पहुँचि बौकूबाबू किएक चकित भड उठलाह ?
उत्तर: आँगन पहुँचि क' बौकू बाबू एही लेल चकित भ' उठलाह, कारण ओ ग्रामसेविकाक प्रति जकाँ सोचि क' गेल छलाह, ओकर ठीक उल्टा दृश्य छलै। (नोट: पृष्ठक अंतिम पंक्ति कें अनुसार)।
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